-ज़िंदगी का एक और रंग-

गुज़री ज़िंदगी के लम्हो को हम तक रहे है
खेले है जो खेल ज़िंदगी ने उन्हे है भाप रहे
तक्दीर के हाथों बिखरने से ख़ुद को रोक रहे है
कही अनहोनी से अपनान आंत जोड ना बैठे
हर पल ज़िंदगी मे रंग लता है
दुख मे ख़ुशी मे, हर रंग कुछ बताता है
आज सादा सादा सफ़ेद सा लगता है समा तो क्या
उमीद का हर रंग रंगीन नज़र आता है
जानते है आज ना सही कल धूम से होली खेलेंगे
आज तूफ़नो के राग से सुर मेला ले हम
कल सूरज की गुद गुदाती गर्मी के मज़े लेंगे
ये विशवाश दिल मे सजाए हूए पल पल जी रहे है
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October 28th, 2007 at 8:29 am
गुज़री ज़िंदगी के लम्हो को हम तक रहे है
खेले है जो खेल ज़िंदगी ने उन्हे है भाप रहे
bahut achchaa
deepak bharatdeep
October 28th, 2007 at 4:03 pm
aap ko mera likha pasand aaya mujeh bahut accha laga … shukriya